आंध्र प्रदेश का तंबाकू क्षेत्र संकट में, विदेशी निवेश ही बन सकता है जीवनरेखा

Edited By Varsha Yadav, Updated: 16 Sep, 2025 01:46 PM

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आंध्र प्रदेश का तंबाकू उद्योग, जो कभी भारत की कृषि निर्यात सफलताओं में अग्रणी रहा है, आज गंभीर संकट से गुजर रहा है।

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। आंध्र प्रदेश का तंबाकू उद्योग, जो कभी भारत की कृषि निर्यात सफलताओं में अग्रणी रहा है, आज गंभीर संकट से गुजर रहा है। लगभग ₹12,000 करोड़ रुपये का यह क्षेत्र न केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार के दबाव में है, बल्कि घरेलू स्तर पर भी कीमतों में भारी गिरावट, बुनियादी ढांचे की कमी और नीतिगत रुकावटों के कारण कमजोर होता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति से उबरने का एकमात्र रास्ता प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के लिए दरवाजे खोलना है।

कीमतों में गिरावट से किसान परेशान

एक समय था जब आंध्र प्रदेश की प्रसिद्ध एचडी बर्ले (HD Burley) तंबाकू वैरायटी ₹230 प्रति किलो में बिकती थी। आज वही तंबाकू ₹110–₹120 प्रति किलो पर आ चुकी है। प्रकाशम, नेल्लोर और गुंटूर जैसे प्रमुख तंबाकू उत्पादक जिलों के किसान अब अपनी लागत भी नहीं निकाल पा रहे हैं। कई किसानों ने अगली फसल लगाने से पहले दो बार सोचने की बात कही है।

यह गिरावट सिर्फ स्थानीय वजहों से नहीं, बल्कि वैश्विक परिस्थितियों के कारण भी आई है। कोविड-19 के बाद वैश्विक तंबाकू मांग में गिरावट आई, जबकि 2023 में बाढ़ से प्रभावित ब्राजील जैसे देशों में तंबाकू की पैदावार में कमी ने अस्थायी राहत दी। लेकिन 2024 में उत्पादन फिर से सामान्य हो गया, जिससे कीमतों में गिरावट आई और भारतीय किसानों को नुकसान हुआ।

एफडीआई की सख्त जरूरत
आज आंध्र प्रदेश का तंबाकू क्षेत्र बुनियादी ढांचे की कमी, पुरानी उत्पादन तकनीकों और सीमित बाजार पहुंच से जूझ रहा है। अगले पांच वर्षों में इस सेक्टर को बेहतर क्योरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, ट्रेसबिलिटी सिस्टम, सस्टेनेबिलिटी सर्टिफिकेशन, और आधुनिक प्रोसेसिंग केंद्रों की सख्त जरूरत है। इन सबके लिए अनुमानित ₹1,500–₹2,000 करोड़ की पूंजी आवश्यक होगी, जो स्थानीय निवेशकों से मिल पाना कठिन है।

एफडीआई इस क्षेत्र को केवल पूंजी ही नहीं, बल्कि आधुनिक तकनीक, वैश्विक नेटवर्क और स्थायी कृषि के लिए जरूरी विशेषज्ञता भी दे सकता है।

विदेशी निवेश पर नीति में बाधाएं
हालांकि भारत सरकार ने रक्षा, अंतरिक्ष और बीमा जैसे क्षेत्रों में भी एफडीआई को मंजूरी दी है, लेकिन तंबाकू जैसे "संवेदनशील" क्षेत्र में अब भी कठोर प्रतिबंध हैं। तंबाकू उत्पादकों को विदेशी कंपनियों के साथ संयुक्त उद्यम (JV) बनाने की अनुमति नहीं है। इससे न केवल निवेशक दूर रहते हैं, बल्कि किसानों को भी अंतरराष्ट्रीय बाजारों से सीधे जुड़ने का अवसर नहीं मिल पाता।

निर्यातक एम. वेंकटेश्वर राव ने कहा, "जब रक्षा में एफडीआई की अनुमति है, तो तंबाकू में क्यों नहीं? यह न केवल राजस्व पैदा करता है, बल्कि लाखों किसानों की आजीविका से जुड़ा है।"

दूसरे देशों से सीखने की ज़रूरत
ब्राजील और फिलीपींस जैसे देशों ने एफडीआई के माध्यम से अपने तंबाकू क्षेत्रों को नया जीवन दिया है। ब्राजील ने आधुनिक प्रोसेसिंग केंद्र, जलवायु-प्रतिरोधी बीज और स्थायी कृषि तकनीकों को अपनाकर किसानों की कमाई में 15–20% की स्थायी बढ़ोतरी दर्ज की है।

फिलीपींस ने संयुक्त उद्यमों के माध्यम से तकनीकी बदलाव लाकर गिरते उत्पादन को फिर से पटरी पर लाया। डिजिटल फार्म मैनेजमेंट और मशीनीकरण जैसी सुविधाओं से उनके किसान अब वैश्विक मानकों के अनुसार उत्पादन कर पा रहे हैं।

नीति परिवर्तन की मांग
आज ज़रूरत इस बात की है कि भारत सरकार, खासकर आंध्र प्रदेश सरकार, तंबाकू क्षेत्र को "ओपन इंडस्ट्री पॉलिसी" के अंतर्गत लाकर एफडीआई को अनुमति दे। सही सुरक्षा उपायों, निगरानी प्रणाली और स्वास्थ्य-संबंधी चेतावनियों के साथ इस क्षेत्र में विदेशी भागीदारी को स्वीकृति दी जा सकती है।

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